माघ मेला स्नान गुरुवार से, तपस्या करने तीर्थराज पहुंचे हजारों श्रद्धालु

तीर्थराज प्रयाग में मोक्ष प्राप्ति के लिए त्याग, तपस्या का प्रतीक कल्पवास, पौष पूर्णिमा स्नान के साथ गुरुवार से आरंभ हो जाएगा। अध्यात्मिक समागम के लिए श्रद्धालुओं का पहुंचना मंगलवार को भी जारी रहा। ट्रैक्टर, ट्रक व दूसरे वाहनों में खाने-पीने, पूजा-पाठ का सामान लादकर करीब 10 हजार से अधिक कल्पवासी माघ मेला क्षेत्र में पहुंच चुके थे। यह क्रम देर शाम तक जारी रहा। रात में मेला क्षेत्र रोशनी से नहा उठा। संत और उनके अनुयायी शिविरों की व्यवस्था दुरुस्त करने में लगे रहे।11_01_2017-magh-mela-1

माघ मेला क्षेत्र में दंडी स्वामीनगर, खाकचौक, आचार्यबाड़ा, काली सड़क, अक्षयवट मार्ग, त्रिवेणी मार्ग शिविरों और वहां रहने वालों से लगभग-लगभग आबाद हो चुके हैं। मान्यता है कि माघ माह में प्रयाग में न सिर्फ मानव कल्पवास करते हैं, वरन 33 करोड़ देवी-देवता विविध स्वरूपों में मौजूद रहते हैं। वह किसी न किसी रूप में कल्पवास करने वाले साधकों को दर्शन देते हैं। यही वह आस्था है, जिसके वशीभूत सनातन मतावलंबी यहां घर-गृहस्थी, मोह-माया से दूर रहकर माह भर धार्मिक कार्यों में लीन रहते हैं। भजन, पूजन, व्रत उनके जीवन का मुख्य ध्येय बन जाता है। कुछ श्रद्धालु पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक और कुछ मकर संक्रांति से कुंभ संक्रांति तक कल्पवास करते हैं।

पुरखों के स्मरण से होगी तपस्या
विभिन्न हिस्सों से आए श्रद्धालु पौष पूर्णिमा पर संगम अथवा गंगा स्नान के बाद कल्पवास आरंभ करेंगे। तीर्थ पुरोहितों के आचर्यत्व में मंत्रोच्चार के बीच मां गंगा, वेणी माधव व पुरखों का स्मरण कर त्याग व तपस्या का व्रत शुरू किया जाएगा। शिविर के बाहर तुलसी का बिरवा लगाकर जौ बोया जाएगा। कल्पवासी घर लौटते समय उसे प्रसाद स्वरूप में वापस लेकर जाएंगे।
एक समय भोजन, तीन बार स्नान: कल्पवास कठिन तप माना जाता है। कल्पवासी सिर्फ एक समय भोजन व दिन में तीन बार स्नान करते हैं। दान का क्रम भी चलता है। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रयाग में दान का काफी महत्व है। परिवर्तन मानव विकास संस्थान के निदेशक ज्योतिषाचार्य डॉ. बिपिन पांडेय के अनुसार पौष पूर्णिमा व अन्य स्नान पर्वों के बाद यथा संभव दान करना चाहिए। अन्न, काला तिल, ऊन, वस्त्र व बर्तन का दान काफी पुण्यकारी रहता है।
जीते जी मिलता है मोक्ष : हरिचैतन्य
टीकरमाफी आश्रम पीठाधीश्वर स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी की राय में कल्पवास करने वाले मानव को जीते जी मोक्ष की प्राप्ति होती है। संगम तीरे गंगा पान संतों के सानिध्य में रहकर यम, नियम से भजन-पूजन करने वाले व्यक्ति की हर कामना पूरी होती है। प्रयाग में कल्पवास करने वाले व्यक्ति को फिर किसी तीर्थ में जाने की जरूरत नहीं होती

 

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