भारत के बोधिधर्म कैसे बन गए चीन में ‘ज़ेन’

story-4_22_12_2016चीन में वू नाम का एक राजा था, जो बौद्ध धर्म अनुयायी था। वह चाहता था कि भारत से कोई बौद्ध शिक्षक चीन आए और बौद्ध धर्म के संदेशों का प्रचार-प्रसार करे। राजा इंतजार करता रहा, लेकिन कोई भी बौद्ध गुरु नहीं आया।

जब राजा 6 साल का हो गया। फिर एक दिन यह संदेश आया कि दो महान, प्रबुद्ध गुरु हिमालय पार करके चीन आएंगे और बौद्ध धर्म के संदेशों का प्रचार करेंगे। राजा वू खुश हो गया।

कुछ समय बाद ची में दो भारतीय बौद्ध आए। वह थे बोधिधर्म और उनका एक शिष्य।

आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव बताते हैं कि, बोधिधर्म का जन्म दक्षिण भारत के पल्लव राज्य के राज परिवार में हुआ था। वह कम आयु में ही बौद्ध धर्म के प्रचारक बन गए थे। राजा ने जब बोधिधर्म की आयु के बारे में जाना तो उन्हें बहुत दुख हुआ। दूसरी तरफ, पर्वतों में महीनों की लंबी यात्रा से थके हुए बोधिधर्म भी राजा पर अपना कुछ खास प्रभाव नहीं छोड़ पाए।

राजा निराश था लेकिन दोनों भिक्षुकों उसने स्वागत किया। उसने उन्हें शिविर में बुलाया और भोजन की व्यवस्था की। इसी बीच, राजा वू ने पूछा, ‘इस सृष्टि का स्रोत क्या है?’

बोधिधर्म राजा की ओर देखकर हंसते हुए बोले, ‘यह तो बड़ा बेवकूफी भरा प्रश्न है! कोई और प्रश्न पूछिए।’

राजा वू भीतर ही भीतर खुद को बहुत अपमानित और क्रोधित महसूस करते हुए भी, उसने अपने को संभाला और कहा, ‘मैं आपसे दूसरा प्रश्न पूछता हूं। मेरे अस्तित्व का स्रोत क्या है?’

यह सुनकर बोधिधर्म और भी जोर से हंसे और बोले, ‘यह तो और भी मूर्खतापूर्ण प्रश्न है! कुछ और पूछिए।’

राजा ने पूछा, बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करने के लिए मैंने कई ध्यान कक्ष बनवाए हजारों अनुवादकों को प्रशिक्षित किया। मैंने इतने सारे प्रबंध किए हैं। क्या मुझे मुक्ति मिलेगी?

यह सुनकर बोधिधर्म गंभीर हो गए। वह खड़े हुए और अपनी बड़ी-बड़ी आंखें राजा की आंखों में डालकर बोले, ‘ क्या! तुम और मुक्ति? तुम तो सातवें नरक में झुलसोगे।’

उनके कहने का मतलब था कि बौद्ध धर्म के मुताबिक, मस्तिष्क के सात स्तर होते हैं। अगर कोई इंसान वह काम न करे जो उस वक्त जरूरी है, और उसकी बजाय कुछ और काम करता है, और यही नहीं, वह उन सभी कामों का लेखा-जोखा भी रखता है, तो इसका मतलब है कि ऐसे इंसान का मस्तिष्क सबसे नीच किस्म का है।

आलम ये था कि राजा वू को इनमें से कोई भी बात समझ नहीं आई। वह गुस्से से भर गया और बोधिधर्म को अपने राज्य से बाहर निकाल दिया। बोधिधर्म को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। लेकिन राजा वू ने अपने जीवन को सुन्दर बनाने का एक मात्र आध्यात्मिक अवसर खो दिया।

दरअसल, ज़ेन को चीन ले जाने का काम बोधिधर्म का ही था। गौतम बुद्ध ने ध्यान सिखाया था। सैकड़ों सालों के बाद बोधिधर्म ने जब ध्यान को चीन पहुंचाया, तो वहां स्थानीय प्रभाव के कारण यह चान के रूप में जाना गया। यही चान जब आगे इंडोनेशिया, जापान और दूसरे पूर्वी एशियाई देशों तक पहुंचा, तो इसका नाम फिर बदला और वहां जाकर यह आखिर ज़ेन बन गया।

 

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